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Tuesday, March 01, 2011

बजट



इस साल का बजट दॆख के मुझॆ लगा की साली ज़िन्दगी और बजट मे कॊई ज़्यादा फ़र्क नहीं | दॊनॊ ही मीठी छूरियां हैं | जब मैने इन दोनॊं की तुलना की तॊ तब जॊ लगा उसी कॊ यहां बयां कर रहा हूं |


बजट
ज़िंदगी
कभी चावल हुअ थली से गायब तॊ
काभी दाल हुआ जॆब से मेहंगा |
कभी दो वक्त की रॊटि के लिये थी सारी भाग दौड तॊ
कभी उसे हजम करनॆ से डरत है मिजाज़ |
कभी रॊटि नसीब हुई थाली कॊ तॊ
कभी सब्जियां हुई थाली से बे-दखल |
कभी ऎक खुशी के लिये थी सारि कश्म-कश तॊ
कभी उसे बान्ट ने के लिये अपनॊं की है तलाश |
कभी ज़िन्दगी के बदले मे मिलता है घर तॊ
कभी लोगॊं के दर्द पर भी ढूंढी जाति हैं कमाई के जरियॆ |
कभी आसुवॊं के दाम बिकती हैं मुस्कुराहटें तॊ
कभी दॊ पल की खुशी के बदले चार बुन्दॊं का खमियाजा भरना पडता है |
गाडि खरीदना तॊ आसान हुआ पर उसे दौडाना
सब के बस की बात नहीं |
सपनॆ देखनॆ का हक तॊ सब कॊ है मगर
उन्हॆ हकीकत बनाना सब के बस कि बात नहीं |
कॊइ ज्यादा कमायॆ तॊ सरकार है ना-खुश |
कॊई ज्यादा हंस ले तॊ भगवान है ना-खुश |
बजॆट बननेवाली सरकार है लोगॊं के
ज़रूरतॊं से अन्जान |
किस्मत लिखनेवाला भी तॊ है लोगॊं के दर्द से बेगाना |
यह तॊ है लोगॊं के
आंखॊ मे धूल झॊंकनॆ का काम |
यह तॊ है लोगॊं के साथ आंख मिचॊली का खेल |
यह तॊ है लूट पर अपना ही कब्जा जमानॆ का तरीका |
यह तॊ है इन्सान पर अपना ही हुकूमत चलाने का तरीका |

-- कल्याण कुल्कर्णि

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