इस साल का बजट दॆख के मुझॆ लगा की साली ज़िन्दगी
और बजट मे कॊई ज़्यादा फ़र्क नहीं | दॊनॊ
ही मीठी छूरियां हैं | जब
मैने इन दोनॊं की तुलना की तॊ तब जॊ लगा उसी कॊ यहां बयां कर रहा हूं |
बजट
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ज़िंदगी
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कभी चावल हुअ थली से गायब तॊ
काभी दाल हुआ जॆब से मेहंगा |
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कभी दो वक्त की रॊटि के लिये थी सारी भाग दौड
तॊ
कभी उसे हजम करनॆ से डरत है मिजाज़ |
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कभी रॊटि नसीब हुई थाली कॊ तॊ
कभी सब्जियां हुई थाली से बे-दखल |
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कभी ऎक खुशी के लिये थी सारि कश्म-कश तॊ
कभी उसे बान्ट ने के लिये अपनॊं की है तलाश |
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कभी ज़िन्दगी के बदले मे मिलता है घर तॊ
कभी लोगॊं के दर्द पर भी ढूंढी जाति हैं कमाई
के जरियॆ |
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कभी आसुवॊं के दाम बिकती हैं मुस्कुराहटें तॊ
कभी दॊ पल की खुशी के बदले चार बुन्दॊं का खमियाजा
भरना पडता है |
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गाडि खरीदना तॊ आसान हुआ पर उसे दौडाना
सब के बस की बात नहीं |
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सपनॆ देखनॆ का हक तॊ सब कॊ है मगर
उन्हॆ हकीकत बनाना सब के बस कि बात नहीं |
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कॊइ ज्यादा कमायॆ तॊ सरकार है ना-खुश |
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कॊई ज्यादा हंस ले तॊ भगवान है ना-खुश |
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बजॆट बननेवाली सरकार है लोगॊं के
ज़रूरतॊं से अन्जान |
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किस्मत लिखनेवाला भी तॊ है लोगॊं के दर्द से बेगाना |
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यह तॊ है लोगॊं के
आंखॊ मे धूल झॊंकनॆ का काम | |
यह तॊ है लोगॊं के साथ आंख मिचॊली का खेल |
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यह तॊ है लूट पर अपना ही कब्जा जमानॆ का तरीका |
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यह तॊ है इन्सान पर अपना ही हुकूमत चलाने का तरीका |
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-- कल्याण कुल्कर्णि
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