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Monday, February 10, 2014

इंतेहा हो गई... मानसिक गुलामी की !


एक पार्टी जो देश के आजादी के 67 साल में से 60 से ज्यादा साल सत्ता में रही और उस में भी एक ही खानदान के लोग कुछ गुलामों के सहारे इस देश को चलाते रहे, इस देश के स्वाभिमान के धज्जिया उड़ाते रहे, इस देश को जाती के आग में झुलस कर अपनी मतलब कि रोटियां सेकते रहे, इन के मनसूबों के लिए आम आदमी ऊर्वरक बनता रहा और देश राख होता रहा । पिछले दस सालों में तो हर क्षेत्र में यह सरकार नाकामियाब साबित हुई । जमीन से ले कर आसमान तक सब कुछ बेच खाया, देश का सम्मान, देश का जोश, देश कि संपत्ति, देश कि सुरक्षा, युवावों का भविष्य, देश का जल, जंगल, नैसर्गिक सम्पदाएँ, सब पर गैर कानूनी तरीके से एकाधिकार स्थापित किया । जब उस पार्टी को इस देश से भगाने के लिए सारे देश में एक मानसिकता बन रही है, तब कुछ लोगों कि बातें सुनकर आश्चर्य और दुःख होता है । अब मेरे जैसे लोगों कि व्यथा सुन कर बहुत से लोगों को हैरानी होती होगी ।

आज जब पुरे देश में खा-अँगरेज़ मुक्त भारत कि बातें व सोच चल रही है, तब कुछ लोग कहते हैं कि "यह पार्टी ऐसे ही इस देश से जानेवाली नहीं है । ख-अंग्रेज़ शायद आज कुछ कमजोर होगयी हो अपने नीतियों व भ्रष्टाचार के वजह से, पर वह वापस आएगी । वे इस देश को ऐसे ही नहीं छोड़नेवाले । आज पप्पू उतना होशियार नहीं है, कल कुछ दिनों में या अगले चुनाव तक उसे राजनीति के तौर तरीकों को सीखकर आनी चाहिए । तब वह कामियाब ज़रूर होगा ।"

ऐसी बातें कोई अनपढ़ लोग नहीं बल्कि पढ़े लिखे लोग जो राजनीति व कुनीति का भेद भली-भाति जानते है वे यह सब कहते हैं ।

तब मेरे जेहन में कई सवाल उठते हैं । क्या उस पार्टी का भारत के राजनीति में बना रहना इतना जरूरी है? क्या हम कभी वंशवाद को राजनीति से दूर कर पाएंगे? क्या लोगों को पता भी है के इन के शासन के चलते हम ने क्या खोया क्या पाया? क्या उस लूट के पैसे का हमें कोई अंदाजा भी है? क्या उस लूट को हम खुद ही भूल ने कि कोशिश कर रहे हैं? क्या हमें पता भी है के पिछले साठ साल का गुजरा वक़्त और लुटी हुई संपत्ति हमारे देश में रहती तो हम क्या कुछ करसकते थे? क्या 125 करोड़ के इस देश में हम एक, दो, कुछ (545) ईमानदार, राष्ट्रवादी, प्रगति रत लोगों को ढूँढ नहीं सकते? क्या हमने हार मान ली है, या हम इसे देश कि दुर्दशा या हमारी किसमत कहकर निराशा में ऐसे ही लुटेरों से शासित होते रहेंगे? या इस मानसिक गुलामी कि सोच से निकल, उस पार्टी को व उस के खानदानी जड़ों को उखाड़ फेकेंगे? हमें एकजुट होकर इसे हकीकत बनानी होगी, वर्ना देश नहीं बचेगा और इस आजाद देश में ही हैम कैद होजाएंगे ।

-- अभिनव भारत

Saturday, November 23, 2013

योग गुरु, स्वामी, (बाबा) रामदेवजी, एक ऐसा नाम...



योग गुरु, स्वामी, (बाबा) रामदेवजी, एक ऐसा नाम...

जिन्होंने न सिर्फ आरोग्य, आध्यात्म व सदाचार का पाठ सारे विश्व को पढ़ा रहे हैं, बल्के उसे अनुप्राणितकर अनुदिन जी कर दिखारहे हैं ।

जहाँ देश में भ्रष्ट, अनैतिक, व क्रौर्य का महिमा मंडन किया जा रहा है और जब चारों और इस व्यवस्था को लेकर निराशा का वातावरण फैला हुआ है, ऐसे समय उन्होंने फिर से भारतीय मूल्य, संस्कृति, व धरोहर को बचाने के लिए हुंकार उठाई है ।

चाहे तो वे  हिमालय कि कण्डरावों में गुफावों में बैठ तपस्या कर अपनी मुक्ति कि गुहार लगा सकते थे, चाहे तो वे अधिकार शाही लोगों का चापलूसी कर उन का गुणगान कर उन से हर दिन सुबह शाम पाद पूजा करवाते, पर उन्हों ने उन सब को ठुकराकर इस देश के हर दीन, पीड़ित, शोषित विप्रों का सेवा कर उन सब को और इस देश को सारी दुनिया में न्याय दिलाने का संकल्प उठाया । जो ऐसी सुख-सुविधा, मान-सम्मान को ठुकराकर सत्य कि पथ पर चलकर पूरे सत्ता को ललकारनेवाले ऐसे संत तो विरलय  ही होते हैं । कहे तो सदी में एक या दो । और हमारा अपना यह सौभाग्य है कि हम ने उन के काल खंड में जन्म लिया और उन का हाथ बटाकर साथ काम करने का हमे सुयोग मिला ।

वे सब से अलग इस लिए लगते हैं क्यों कि उन्हों ने न सिर्फ सत्य, सच्चरित्र व सदाचार का मार्ग दुनिया को दिखलाया पर उस सत्य व चरित्रवान जीवन को कैसे राष्ट्र निर्माण व सामजिक परिवर्तन के काम में उपयोग किया जा सकता है इसका बहुत बड़े स्तर पर उदाहरण प्रस्तुत किया है । 

ऐसे विश्व संत शिरोमणि भारत मा के सच्चे सपूत के अनुयायी कहलाने में हम धन्यता महसूस होती हैं ।  साथ ही, उस उपरवाले भगवान का आभार प्रकट करने का मन करता है कि उन्होंने हमें इन का सांगत्य दिया ।

अब चाहे आप हमें बाबा का भक्त कहो या पागल अब यह सब तो हमारेलिए उपहार हैं । पर अकेले में कभी अपने दिल को टटोल के देखना कि बाबा ने आप का क्या बिगाड़ा है और क्या छीना है और गर आप इन के जगह होते तो क्या आप इतने विरोध मोड़ लेते? गर कारोबार है तो, किसी को लूटने के लिए नहीं । गर इन का बिजनेस ही उद्देश होता तो  क्यों खामखा सत्तावों से टकराते? गर आप कि आत्मा इन को सही कहे तो साथ जरूर देना ।

-- के. कल्याण  

Friday, September 13, 2013

उठो... जागो..!





रुकना न तू , झुकना न तू 
मंजिलों की राह पर कभी थकना न तू 
आंधी है तू, तूफ़ान तू 
माँ भारती का वीर संतान तू |

विश्व की आबादी का
यौव्वन है तू,
जो ठान ले तो बदलदे
भारत का भविष्य तू |

अपनी शक्ति को भूला
कहाँ अग्न्यात में जी रहा है तू,
यूँ सदियों से सहेम सिमटकर
क्या पाया है तू ?

देश की दुर्दशा पर आँख मूंद
अपनी छोटी सी आशियाँ में खुश होना न तू,
युवा है तू, बुलंद है तू
देश के शौर्य के उबाल का प्रतीक तू |

यूँ सभ्यता के आढ़ में खुद को छुपा कर
कर ना न अपने ही वतन से गद्दारी तू,
यह संग्राम है अस्तित्व का और स्वाभिमान का
कहीं बीच राह पर छोड़ राण को न भाग तू |

यूँ बुराई व अन्याय का बखान कर
अपनी लाचारी का परिचय देना छोड़ तू,
हाँ, हो ने दो सत्य के पथ पर अन्धकार घमासान
हिम्मत जो करले तू तो इसी राह पर मिलादे भोर तू |

होंगे बड़े राजनीति में कुम्भकर्ण बकासुर
जैसे असुर महान,
भाग जायेंगे सब, तू जो ले हाथ में
सुदर्शन या तीर कमान |

एक बार निकला तो घर से फिर सोचना न
स्वार्थ के सपनों का होगा क्या?
जब सूरज बनकर फैलादे तू दुनिया में रोशनी
सोच के दिया बन कर जलने में रखा है क्या?



-- अभिनव भारत

Wednesday, August 07, 2013

"भारत स्वाभिमान" गीत


यह कविता भारत के नागरिकों के लिए नहीं बलके भारत के सच्चे सपूतों के लिए समर्पित है | 

मैं भी लिख-लिख कर प्रेम गीत मजनू के हिस्से के पत्थर गिना सकता हूँ,
मैं भी पी-पी कर देवदास की प्यालों का नुमाइश लगा सकता हूँ,
पर, मैं फिर से लाठी को गाँधी का हाथ थमाने आया हूँ,
मैं बहनों को झाँसी की तलवार बाजी सिखाने आया हूँ | (१)

मैं भी सुपर मॉम को देखकर, सुपर डैड बनने की तय्यारी कर सकता हूँ,
मै भी इण्डिया के सबसे बड़े ड्रामे बाज़ का ड्रामे का डैडी बन सकता हूँ, पर
मै जिजामतावों को शिवाजी के साहस की कहानियां फिर से सुनाने आया हूँ,
मै फिर से फंदों के लिए भगत, सुखदेव और राजगुरु के गले का नाप लेने आया हूँ | (२)

मै भी मर्यादा व सभ्यता को लांघती सर्कस में कॉमेडी कर सकता हूँ,
मै भी चंद गिने चुने सवालों के उत्तर दे कर करोड़ों कमा सकता हूँ, पर
मै जलियाँवाला बाग में मशाल लिए, उधम का हाथ थामकर चलाने आया हूँ,
मै काकोरी के जाँ-बाजों के शहादत से खाली हुई जगहों को फिर से भरने आया हूँ | (३)

मै भी क्रंच में मदहोश होकर अपने चरित्र (कैरेक्टर) को मंच (munch) कर सकता हूँ,
मै भी भावुकता में हद से बहकर, उसे अत्याचार का लेबल लगा सकता हूँ, पर
मै बंकिम के वन्दे मातरम का साहस देकर आन्दोलनकारियों को जगाने आया हूँ,
मै सोये हुए राणा और चौहाण को फिर से प्रताप दिखा ने के लिए जगाने आया हूँ | (४)

मै भी बॉस के आँगन में रासलीलाएँ खेलकर अपने शुचिता का बखान कर सकता हूँ,
मै भी घर पर नाचने-गानेवाले, टैलेंट से भरपूर लोगों का एक टीम बना सकता हूँ, पर
मै गुरु गोविन्द और बन्दा बैरागी को फिर से शहादत का निमंत्रण देने आया हूँ,
मै सरफरोशी के तमन्ना रखनेवाले उन मद-मस्त हवावों के चोली को बसंती रंगने आया हूँ | (५)

मै भी देश की हालत पर ओरों को कोस्- कोस्कर, अपने दिल की आग को बुझा सकता हूँ,
मै भी कोई सिनेमा देख या हारी हुई मैच की विलम्बित (बिलेटेड) कॉमेंटरी कर के खुद को बहला सकता हूँ,
पर, मै नेताजी के ऐ. एन. ए. के वीर क्रांतिकारीयों के जीन्स को ढूंडने आया हूँ,
मै अपने लिए सीमापर जान लुटाते भाइयों के लिए मर-मिटने आया हूँ | (६)

सब ठीक है पर, मै……!

मै कौन?

मै,
मै वही स्वाभिमान हूँ, जो सब के भीतर रहता हूँ,
मै वाही हूँ जो तुम्हारी हर गलती पर टोकता-रोकता रहता हूँ |
मै वही हूँ जो तुम्हारी हर ज़िद को खामोशी से सह लेता हूँ |
मै वही हूँ जो मर कर भी नहीं मरता हूँ |
मै वही हूँ जो हर पल तेरी उन्नति चाहता हूँ |
मै हूँ तुम्हारे भीतर का सच्चिदानंद (सत्य-चित्त-आनंद) स्वरुप,
मै हूँ सब के भीतर का “आत्म ब्रह्म” |

-- अभिनव भारत

Wednesday, June 13, 2012

|| एक वरदान मंगाते हैं ||

एक वरदान मंगाते हैं हम भारतवासी
हे तारण हार हो सकेतो हमें

भगत सिंह की जवानी देदे
या सुभाशचंद्र बोसा की रवानी देदे
या दे सको तो लाल बहाद्दुर शास्त्री की ऐयाशी देदे
या फिर बापू की कर्मठता ही देदे |

|| एक वरदान मंगाते हैं ||

उधम सिंह की बे-खौफी देदे
या मदन लाल धींगरा की आवारगी देदे
या दे सको तो आजाद चंद्रशेखर की आजादी देदे
या फिर झांसी की रानी का कोई अधुरा सपना ही देदे |

|| एक वरदान मंगाते हैं ||

अस्फाख की दीवानगी का असर देदे
या रामप्रसाद बिस्मिल की अडिगता देदे
या दे सको तो सरदार पटेल की साख ही देदे
या फिर सावरकर की साहस का नमूना देदे |

|| एक वरदान मंगाते हैं ||

विवेकानंदा की विवेक और आनंद देदे
या लाखों शहीदों की शहदाता का जजबा देदे
या दे सको तो उन वीरों के रूह का ईमान उधार देदे
या फिर भारत माँ के सच्चे सपूत बने ऐसी मनःस्थिति देदे |

|| एक वरदान मंगाते हैं हम भारतवासी ||

-- के. कल्याण

आंदोलनों से होगा क्या?

कई लोग पूछते हैं की इन आंदोलनों से होगा क्या
न सरकार समझनेवाली न जनता बदलनेवाली है ||

यह युद्ध नहीं है सामाजिक परिवर्तन का
यह संग्राम है खुद से खुद का, तो खुद को ललकार के तो देखो |

अरे भईया स्वार्थ की शीतलता को छोड़
बस ऐसी एकता का मशाल लिए कुछ दूर चलके तो देखो |

लोहा क्या पत्थर भी पिघलेंगे
देश स्वाभिमान की ऐसी आग लगा के तो देखो |

हमने खूब लगाये नारे बापू और भगत सिंह के
चलो एक बार उस मगरूर नशे को जी कर तो देखो |

भेडिये हैं बहोत समाज में
बस एक शेर की दहाड़ लगाकर तो देखो |

इन काले बादलों में सूरज भी अपने उजालों को समेट ले पर
एक अपनी दिल की उम्मीदों की दिया को बचाकर तो देखो |

-- के. कल्याण

Saturday, January 07, 2012

वीर सन्यासि "स्वामि विवेकानंद"



आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाओ ॥

स्वर्ग और नरक से निकलकर आओ
मीठा और कडवे को मिलाकर आओ
तेरा और मेरा का भाव मिटाने आओ
प्रॆम और वात्सल्य की शासन लिखने आओ

आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ 

इतिहास के पन्नों से उठकर आओ
दिशाविहीन मतृभूमि को दिशा दिखाने आओ
अपनों के मन के मैल को धोने आओ
भविष्य के पथ के ज्योति बनकर आओ

आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ 

सत्य-अहिंसा के ध्व्ज को फ़हराने आओ
सब को सुख-शांती का निवाला खिलाने आओ
इन अनाथों की चीख सुनकर आओ
भारत माता के तेजोमय सपूत बनकर आओ

आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ 

गरीबी की की प्यास बुझाने आओ
विश्व मानवता के पाठ पढाने आओ
मा के सीने की आअग को ठंडा करने आओ
मा भारति के शील की रक्षा करने आओ

आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ 

जननी के आसुओं को पोछने आओ
हर चेररे पे मुस्कान बिखरने आओ
संकल्प लिये, भगवा पहने, कार्य तत्पर होकर आओ
जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त होकर आओ

आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ 

भूमि के गर्भ से, प्रकृति के निनाद से आओ
अंबर के भीतर से, सागर के प्रवाहों से आओ
कानन के मौन से, हिंदु के हृदय से आओ
फ़िर एक बार विश्व का मस्तिश्क भारत के आगे झुकाने आओ

आओ हे विवेकानंद आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ 

-- कल्याण कुल्कर्णि

Sunday, October 02, 2011

मै भारत का रहनेवाला हूं


मै भारत का रहनेवाला हूं
एक भारतवासी की व्यथा सुनाता हूं
अपने घायल जजबात के आसुओं को
स्याही बनाकर बहाता हूं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

जब जब अपने भाई सीमा पर लडते शहीद हुए
और उनके शहादतों पर सियासी ठेकेदारों ने
समझौतों से कफ़न ओढ दिये
जब उन वीरों के मा और विधवाओं के आंचल मे
चंद रुपियों के टुकडे डाल
दॆश के ईमान को शांति मंत्रों से तोल दिये

तब तब अपने आहत दिल को कलम थमाकर फिर
अपने आंचल सी कागज पर खूब स्याही के आसुं बहाता हूं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

जब जब निर्दॊश कोई अतंक का शिकार होता है
ज़िंदगी मौत से अपना कसूर पूछता है
और जब दॊशी जेलों मे अपनी मनमानी से जीता है
सरकार उसे जीने का हक देने की बात पर अडजाता है
और जो गुज़र गये उनके लाशों पर फ़र्ज़ी मदत का वादा कर
हुकूमत अपने दायें जेब से बायें जेब मे पैसा बदलता है

तब तब अपने घायल दिल के ज़ख्मों को कायरता का
चॊली पेहना कर सभ्यता के मुखौट मे फिर से बिलख बिलख कर रोता हूं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

जब जब किसान कोई अपने हक के खातिर लडता है
सियासत अहंकार मे उस पर डंडे और गॊलीयां बरसाता है
यह कैसे तडक्की के मायने हैं
या अपना सब कूछ सौंप दो या फिर जीने का आस छोड दो
नजाने यह सरकार कौन सी नई फसल उगाना चाहता है
अपनॊं का रक्त बहाकर नजाने कौन से ज़िंदगी के बीज बोना चहता है

तब तब मै इस कुरुक्षेत्र मे खुद को इन तडक्की के मायनों के
चक्रव्युह मे अभिमन्यू सा पात हूं और इस मंजर को देख सिसकियां भरता हूं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

जब जब सरकार रात के चोरों को पकडने के लिये जाल बिछाता है
और दिन के लुटेरॊं को सफ़ेद कपडों मे छुपाता है
जब अधीकार और दौलत के नशे मे अपनों के पेट से सौदा करता है
जब बत्तीस रुपिये वालों को अमीर करार कर खुद को तसल्ली देना चाहता है
जब गरीबी और बेबसी के चीखॆं संसद को टकराकर खाली हात लौट आती हैं
अंदर का नेता जब देश की हालत पर गांधी के तीन बंदरों को अपने मे धारण करलेता है
  
तब तब समंदर सा जजबातों का उबाल आता है मेरे खून मे
और परबत सा उछाल आता है शौर्य का नसों मेपर मै
बस बेबसी और लाचारी की राशन का आदतन होगया हुं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

जब दस जनपथ की पथ पर एक सत्य दस टुकडों मे बट जाता है
जब राज भवन की स्वार्थ शोरों मे उम्मीद का दम टूट जाता है
जब कौरव सभा सी संसद मे सविंधान का हर दिन चीरहरण होता है
जब इस देश का स्वाभिमान भिश्म सा शय्या पर लेटजाता है
जब चुनाव मे जयचंद या मीर-जाफ़र मे से एक को चुनना पडता है
जब सारा देश उस तारणहार के इंतज़ार मे अपने धनंजय के दायित्व को भूल जाता है

तब तब मै अपनी दोहरी मनसिकता के कारण संवेदना हीन होकर
घर बैठ कर संजय सा टी.वी. पर लुटते भरत की तस्वीर को
धृतराष्ट्र की भांती अंधा, बेहरा और मौन होकर विवशता के आढ मे देखता हूं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

जब जब पश्चिम का पर्चम आंखों से उतर सीने पर लेहराता दिखत है
जब भरत मा को कोस, सपूत कोई, मौशी के गोद मे खुद की धन्यता समझता है
जब 
दॆश राजनैतिक बेडियों से निकलकर मानसिक गुलामी मे कैद नज़र आता है
जब कोई केहता है की न वह भगत क भाई है, न गान्धी का संबंधी है
जब मौल्य विहीन शिक्षण मातृ भूमी को मंडी बनाकर अपनों को लुटना सिखाता है
जब कोई बीती गौरवशाली इतिहास के गुण गाने मे ही वर्तमान को भुला देता है


तब तब फिर से "शायद एक दिन सब बदलेगा" यही सोच के
उस कल के चाहत मे अपने चादर मे सदियों से
करवट बदल बदल कर रात गुज़ारता हूं

मै भारत का रहनेवाला हूं ॥

-- कल्याण कुल्कर्णि

Sunday, September 11, 2011

कितना बदलगया हिंदुस्तान !


भूखों को खाना नहीं मिलता है
और कहीं बदन छुपाने को कपडा
बस मिलती है तो बेमौत हर दिन मौत यंहा

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

मेहंगाई के बॊझ तले दबते हैं अरमान
अरमानॊं की अर्थी लिये जीते हैं इन्सान
बन गयी है पत्थर फत्थरोन को पूजनेवालि सन्तान

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

इन्सानियत को न ढूंडिये, बिकते हैं ईमान यहां
ज़िंदगी तो सस्ति है पर लगति हैं मुर्दॊं के बॊलियां यहां
घायल दिल के पचास हज़ार और रुकी सासॊं के एक लाख हैं दाम यहां

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

खुदगर्जी के मांजे ने काट दिये धागे मोहब्बत के पतंगों के 
खुशियॊं के शॊर मे दब गयी हैं दर्द अपनॊं के चीखॊं के
इस दुनिया की मेहफ़िलों मे हैं गूंजते राग तनहाई के अहेसासॊं के

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

आज़ादि तो है बस बेहॊशी मे ख्वाब बुनने का
हक तो है बस चुन कर लुटेरॊं कॊ लूट के ठेके देने का
चलते हैं यहां हस्तक्षेप परायॊं के, स्व-राज तो है बस नाम का

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

अजब गणतंत्र का गज़ब शासन है यहां
तंत्र है करती शॊषण हर दिन गण का यहां
बस धन और बल का है बॊला-बाला यहां

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

राम की सन्तानॊं मे आज पलते हैं रावण यहां
श्याम की भूमि पर है कंस, जरासंध के उपासक यहां
सत्य को हर कदम कुरुक्षेत्र से गुजरना पडता है यहां

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

झांसि की राणी का शीश झुकता है, देख कयरता के दुश्य यहां
भगत और बिस्मिल के जुनून को देते हैं आतंकी करार यहां
शहीद नहीं, सिर्फ़ सत्ता पर बैठे ऐय्याश हैं मर्यादित यहां

कितना बदलगया हिंदुस्तान !

हां अब अपनी बारी है, अपनी ज़िम्मेदारी है
कुछ भी हॊ अब देश का भाग्य बदलना तो ज़रूरी है
आज के अपने आलस्य से कल के भारत को न डूबने देना है

अब तुझे बदलना ही होग हिंदुस्तान...!
हां अब तुझे बदलना ही होग हिंदुस्तान...!

-- कल्याण कुल्कर्णि

Friday, August 19, 2011

सवाल काल (समय) के

जिसने खीलाया उस किसान पर ही जॊ बंदूकॆं तान रहा
उन पापियॊं कॊ क्या ज़माना कभी माफ़ कर सकेगी?

जॊ सत्ता के गलियारॊं पर मॊहित हुआ
उस मन कॊ क्या कभी ज़माना स्वीकारेगी?

जिस भ्रष्टाचार के रावण ने जन-जन का है जीना मुष्किल किया
उस दानव राक्षस कॊ जनता क्या ऐसे ही बढते दॆख सकेगी?

जिस के इरादॊं मे कॊई खॊट नहीं
उसे क्या खाक ज़माना रॊक सकेगी?

जिसे मौत की खौफ़ न डग-मगा सकती नहीं
उस मस्त हवा कॊ मौत क्या खाक मार सकेगी?

जिसने भी भागत, बिस्मिल और ऊधम की जवानि कॊ भूला नहीं
उन मद-मस्त वीरॊं कॊ क्या दीवारॆं कैद कर सकेंगी?

जिसे जलियंवाला बाग और दंडि सत्याग्रह की याद रही
उस जॊष के आंधी की रुख कॊ ज़माना मॊड सकेगी?

जिस सरकार की करतूतॊं पर सारा कौरव सभा भी लज्जित हॊति हॊ
उस तमाशे कॊ क्या भारत की संतानें यूंही मौन से देख सकेंगी?


चलॊ साथियॊं अब अण्णा के पंचजन्य का बिगुल चारॊं दिशावों मे गूंज उठा
अब बच्चा क्या बूढा भी जॊश-ऎ-जवानी के रस मे घॊल उठा ॥

कहीं बस तॆरि कमी न रह जाये इस पूरे संघार्ष मे
सारा हिंदुस्तान बदल जाये
पर तु रहे जकडे अपने ही निहित स्वार्थ के बेडियॊं मे ॥


-- कल्याण कुल्कर्णि

Monday, April 18, 2011

तु जो चलदे साथ मिलके


लेहर-दर-लेहर बदलाव की युंही उठती रहे जबतलक सैलाब कोई उठता नहीं
चिंगारियां युंही उडति रहे जबतलक आग दिलॊं की आवाम की आग बनता नहीं ||

घर बैठकर जुल्म-ओ-सितम और ना-इन्साफ़ी पे रॊना तेरी किस्मत नहीं
तू जो निकला बान्ध के कफ़न करवां ये मंज़िल से पहले रुकता नहीं  ||

कल को बदल ने की चाह दिल मे और आसमा को छूती उडान
चल आज सिखादे उनको सबक हुम जो समझते हैं हमे नादान ||

आक्ल की परदे को हटा कर पेहचानना हॊगा अपनॊं के भीड मे दुश्मन तुम्हे
बिछड गये थे जो भाई सियासतॊं की आंधियॊं मे चलन है उन्को अपना के तुम्हे ||

मशाल कॊई ऐसी जलादे अपनॊं के राह मे जो सदियॊं के लिये रॊशन रहे
तू नहीं तो क्या तेरे हौसलॊं के चर्चे अब दुश्मन की नींद उडाति रहे ||

आ बुलारहा है मादिर-ऎ-वतन और मांग रहा है बलिदान
मौत को भी मात दे तू, ज़िंदगी तो है चार दिनॊं का मेहमान ||

कब तलक यूंही जियेंगे मुर्दॊं की तरह, चल आज लगादे खुद मे भी आग
या जियेंगे, या मरेन्गे, या फ़िर नई सी लिखेंगे इस मात्रु भूमि के भाग ||

हौसला देती हो जिन्हे, भगत और सुभाश की शहादतॊं की वीरानियां
उम्मीद जीत की देती हो जिन्हे गांधी की सत्य-अहिंसा-सत्याग्रह की ज़िद्दी कहानियां ||

दुश्मन हो तेरा कितना भी शातिर, चालाक और खूंकार
राम और कृष्ण जब साथ तेरे, हॊगी कभी नहीं तेरी तो हार ||

तू जो चलदे साथ मिलके दूर नहीं अब मंज़ील भी हम से और मुश्किल भी है आसान
कम न आंक खुद को तू, ऎक पत्थर तो फेंक ज़रा सॊच के कल बदलेगा हिंदुस्तान ||

-- कल्याण कुल्कर्णि