सत्य और धर्म की पुरवाई बहाओ ॥
स्वर्ग और नरक से निकलकर आओ
मीठा और कडवे को मिलाकर आओ
तेरा और मेरा का भाव मिटाने आओ
प्रॆम और वात्सल्य की शासन लिखने आओ
आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ ॥
इतिहास के पन्नों से उठकर आओ
दिशाविहीन मतृभूमि को दिशा दिखाने आओ
अपनों के मन के मैल को धोने आओ
भविष्य के पथ के ज्योति बनकर आओ
आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ ॥
सत्य-अहिंसा के ध्व्ज को फ़हराने आओ
सब को सुख-शांती का निवाला खिलाने आओ
इन अनाथों की चीख सुनकर आओ
भारत माता के तेजोमय सपूत बनकर आओ
आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ ॥
गरीबी की की प्यास बुझाने आओ
विश्व मानवता के पाठ पढाने आओ
मा के सीने की आअग को ठंडा करने आओ
मा भारति के शील की रक्षा करने आओ
आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ ॥
जननी के आसुओं को पोछने आओ
हर चेररे पे मुस्कान बिखरने आओ
संकल्प लिये, भगवा पहने, कार्य तत्पर होकर
आओ
जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त होकर आओ
आओ हे वीर सन्यासि आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ ॥
भूमि के गर्भ से, प्रकृति के निनाद से आओ
अंबर के भीतर से, सागर के प्रवाहों से आओ
कानन के मौन से, हिंदु के हृदय से आओ
फ़िर एक बार विश्व का मस्तिश्क भारत के आगे झुकाने आओ
आओ हे विवेकानंद आओ
सत्य और धर्म की पुरवाई बहाने आओ ॥

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