लेहर-दर-लेहर बदलाव की युंही उठती रहे जबतलक सैलाब कोई उठता
नहीं
चिंगारियां युंही उडति रहे जबतलक आग दिलॊं की आवाम की आग बनता
नहीं ||
घर बैठकर जुल्म-ओ-सितम और ना-इन्साफ़ी पे रॊना तेरी किस्मत नहीं
तू जो निकला बान्ध के कफ़न करवां ये मंज़िल से पहले रुकता नहीं ||
कल को बदल ने की चाह दिल मे और आसमा को छूती उडान
चल आज सिखादे उनको सबक हुम जो समझते हैं हमे नादान ||
आक्ल की परदे को हटा कर पेहचानना हॊगा अपनॊं के भीड मे दुश्मन
तुम्हे
बिछड गये थे जो भाई सियासतॊं की आंधियॊं मे चलन है उन्को अपना
के तुम्हे ||
मशाल कॊई ऐसी जलादे अपनॊं के राह मे जो सदियॊं के लिये रॊशन
रहे
तू नहीं तो क्या तेरे हौसलॊं के चर्चे अब दुश्मन की नींद उडाति
रहे ||
आ बुलारहा है मादिर-ऎ-वतन और मांग रहा है बलिदान
मौत को भी मात दे तू, ज़िंदगी तो है चार दिनॊं का मेहमान
||
कब तलक यूंही जियेंगे मुर्दॊं की तरह, चल
आज लगादे खुद मे भी आग
या जियेंगे, या मरेन्गे, या फ़िर नई सी लिखेंगे इस मात्रु भूमि के भाग ||
हौसला देती हो जिन्हे, भगत और सुभाश की शहादतॊं की वीरानियां
उम्मीद जीत की देती हो जिन्हे गांधी की सत्य-अहिंसा-सत्याग्रह
की ज़िद्दी कहानियां ||
दुश्मन हो तेरा कितना भी शातिर, चालाक
और खूंकार
राम और कृष्ण जब साथ तेरे, हॊगी कभी नहीं तेरी तो हार
||
तू जो चलदे साथ मिलके दूर नहीं अब मंज़ील भी हम से और मुश्किल
भी है आसान
कम न आंक खुद को तू, ऎक पत्थर तो फेंक ज़रा सॊच के कल
बदलेगा हिंदुस्तान ||
-- कल्याण कुल्कर्णि
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